कहते है इंसान ईश्वर की सर्वोत्रम कृति है क्यों कि इसमें दिमाग और ज़बान दी है जो हर स्थति में अपने आप को डालने कि शक्ति दी है और बदलने कि भी अपने इसी दिमाग से नए नए अविष्कार भी किये है जिससे इंसान कि जिंदगी आराम दायक हो गयी है पर इस अछे दिमाग में शैतानी दिमाग भी है जिसने इंसान कि जिंदगी बदतर बना दी है व्यक्ति जब अपने आप को सुपर समजने लगता है तब वो इस दिमाग का दृरुप्योग करने लग जाता जो मानवता के लिए अभिशाप है उससे समाज में कई विसंगतिया उत्पन हो जाती और समाज गर्त कि और अग्रसर होने लगता व्यक्ति में एगो उत्पन हो जाता है वो अपने आप को सर्वेसर्वा समजने लगता है जिससे समाज और देशो में टकराव बेचैनी ,परेशानिया और बुराइया व्याप्त हो जाती है इससे वक्त और पैसो का बर्बादी कि और कदम बरता ही जाता है ,नतीजा कुछ नहीं हासिल होता है इतना सब होते हुए उसका सुख और चैन चला जाता है उसको जिंदगी जीना दुश्वार हो जाता है व्यक्ति और देश एक दुसरे के लिए खून के प्यासे हो जाते है सिर्फ एक एगो कि खातिर व्यक्ति अपने दिमाग कि दिशा कि बदल देता है जो इन्सनियक के लिए महा अभिशाप है ,ईश्वर कि इतनी सुंदर रचना होते हुए अपनी छबि बिगार देता है कही बार जानवर उससे ज्यादा सुंदर एम सवेदनशील नज़र आता है जो अपने आप में मस्त होता है न उसे फिक्र पैसो कि न आराम कि न ईर्षा एम द्वेष न जातीवाद ,न भाई भतीजा वाद कि ,जहां चाहे चला जाता है जहा चाहे खा लेता है जहाँ चाहे सो जाता है ,उससे प्यार करो तो प्यार देता है समझाओ तो समजता है ,वक्त पर मदत भी करता है और कमा कर भी देता है जीते जी तो देता है मरने के बाद भी उसके अंग काम आते है और इन्सान उससे भी कमाता है ,कुछ लेता नहीं है सिर्फ प्यार के ,इंसान खुद फेसला करे उसे क्या बन कर रहना है .ईश्वर के दिए हुए इस बेशकीमती दिमाग का सदुपयोग या दुरूपयोग .