कितनी अजीब और खुदगर्ज सोच है आज के इंसान की ज्यादा वक्त नहीं हुआ है कि भूल जाये गुजरे हुए ज़माने को कि वोही जमीन है वोही नज़ारे है वोही चाँद तारे है और वोही इंसान का चेहरा है पर सोच अलग है ,प्यार के माइने अलग है ,जीने का ढंग अलग है ,कहता है भाई हु पर उसकी परिभाषा उसके पास अलग है ,कहता है दोस्त हु पर उसकी परिभाषा उसके पास अलग है ,कहता है नेता हु पर उसकी परिभाषा उसके पास अलग है ,मज़े कि बात यह कि ये सब परिभाषाये वोह जबान से बया नहीं करता है उसके मन में रखता है .आखिर इंसान के अंदर ये क्या चल रहा है जो सारे सामाजिक ढांचे को नेस्तनाबूत करने पर तुला है सिर्फ अपने अहम् के लिए जो तुच्छ है ख्यरिक है ,अल्पकालीन है ,शायद समाज में नेतिकता का अभाव रह गया है ,उच्च शिख्या ने इन सब को पीछे छोर दिया है या इंसान खुद सिर्फ पैसे के पीछे भाग रहा है और अंधी दोढ़ में अपने को लाइन में लगा दिया है जहाँ केवल यही नज़र आता है बाकि सब पीछे रह जाता है जिसमे जिंदगी के मानदंड ही बदल जाते है ,जीने का नजरिया भी . जरुरत है इस पर काबू पाने कि ,जरुरत है ,व्यक्ति कि सोच कि दिशा बदलने कि ,जरुरत है इंसान के माइने कि ,उसके जीने के अंदाज़ कि ,जरुरत है ,भाईचारे एम प्यार कि किसी कवी के ये शब्द कितना बया करते है ....
नहीं जरुरत है पैसे और खिदमत कि इस लाचार को
कि सब कमी दूर कर देती है प्यार के दो बोल किसी के
कि जहां में आये है सब चार दिनों के लिए इस खुबसूरत बगीचे में
जहां लहरा रहे है सुंदर फूल जिंदगी के ,साथ में ले जाने के लिए .