जिंदगी बहुत खुबसूरत है जी चाहता है कुदरत के नजारों को देखते ही रहो ,देखते ही रहो कब दिन गुज़र जाये कब रात आ जावे ,पता ही नहीं चलता ,सुबह की वेला अपने आप में अलग ही छटा बरसाती है जब रात अपनी रवानगी पर होती है दिन का उजाला अपनी रोनक दिखलाना शरू कर रहा होता है पते खिले हुए होते है और उन पर ओंस की बुँदे चार चाँद लगा रही होती है कही कलिया खिल कर फूल बन रही होती है ,हवा के मस्त झोंको से टहनिया झूम रही होती है ऐसा लगता है फूल झूम झूम कर हस रहे हो और अपनी ख़ुशी का इज़हार कर रहे हो की अब वो जवान हो कर अंगराई ले रहे है और चारो और खुश हो कर ख़ुशी का समां बाँध रहे है , तबी आकाश के उरते परिंदे भी अपनी प्यारी आवाज में मौसम को और रस भरा बना दिया ,दूर कोयल की कु कु ने पुरे समां को मधुर आवाज़ से कानो में रस गोल दिया ,बगीचे की घास भी अपने रंग में आकर पूरी तरह खिल रही है और हमारे कदमो का इंतज़ार कर रही है तबी यकायक बादलो ने अपनी रिम्जिम बोछारे गिरा कर अपनी उपिस्सथी का बाण कराया की यह कहकर की वो भी इस खुशनुमा माहोल में शरीक है फिर अब क्यों नहीं इंसान का मन थिरके नाचने को और झूम झूम कर मौसम को गले लगाने मे। तबी पास ही किसी रेडियो में ये धुन कानो को चीरती हुई गुजरी "मौसम है अश्काना ई दिल कही पे उनको ढूंढ़लाना " ऐसा महसूस होता है की हम ईशवर की बनाई इस कायनात का एक हिस्सा है और इस वक़्त किसी जन्नत से कम किसी स्थान में नहीं है ,अनायास ही सिर ईशवर के चरणों में झुक गया और मुह से बरबस आवाज़ निकली "वाह मालिक वाह तेरा कोटि कोटि शुकराना की आपने मुझे यह जन्नत नसीब दी "
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