Monday, July 5, 2010
खुशिया
आहा कैसी सुहानी सुबह है चारो और हरयाली और हरयाली छाही हुई है भीनी भीनी खुशबू से पूरा माहोल चहक उठा है बरसात कि छिनी छिनी फुहारे अभी भी हवा के साथ मिल कर ठंडक कि लहर पल पल छ रही है इससे अब ये विश्वास हो गया कि रात भर बरसात ने मौसम को शुश्ग्वर बना दिया है वाह री कुदरत वाह तुम्हे लाख लाख शुकराना कि आखिर तुम्हे इस धरती का खियाल आया । अब आपसे विनीति है कि इस महोल को पुरे तीन महीने बनाये रखना ताकि इस धरती में अन्दर पानी पहुच जावे । कितना अच्छा लगता है यह सब देख कर कि चारो और खुशियों कि बहार और बहार नज़र आती है .खुशिया और खुशिया यही तो हर इन्सान चाहता है जिंदगी भर नहीं तो जीवन का किया मतलब इसके बगेर वीरानी और वीरानी ही है और खुशिया आती है प्यार से और अब वो प्यार नहीं रहा इंसानों मैं इसकी जगह ले ली है पैसो ने सिर्फ पैसा यानि रुपैया और वोह भी सदा रहने वाला नहीं फिर कियो पैसे से इतना प्यार और प्यार जो अपने आप मैं बहुत शक्ति रखता है जो अद्भुत होता है जो अमर है जिसे कोही छीन नहीं सकता है झो खुशियों से लबरेज है उसे कियो नहीं प्राप्त किया जावे जिससे सभी दुःख दूर हो जाते है और खुशियाँ चारो और सिमट जाति है पैसो को केवल जरुरत समज कर इस्तेमाल किया जावे और उतना ही कमाया जावे जितनी जरुरत होवे तो यह संसार आपसे मिल जायेगा ख़ुशी दो और ख़ुशी लो .
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment